डोडीताल में विराजे हैं ‘डोडीराजा’, मां पार्वती ने यहां दिया था भगवान गणेश को जन्म
केदारखंड के अध्याय 10 में गणेश के प्रकृति से उत्पन्न होने का उल्लेख मिलता है। स्थानीय मान्यता में डोडीताल को डुंडीसर से भी जोड़ा जाता है।

उत्तरकाशी। घने जंगलों के बीच करीब तीन हजार मीटर से अधिक की ऊंचाई पर शांत झील और हिमालयी चोटियों से घिरा डोडीताल। यही वह पवित्र धाम है, जिसे स्थानीय लोग भगवान गणेश की जन्मभूमि मानते हैं। यहां गणेश किसी नाम भर के देवता नहीं, बल्कि डोडीराजा के रूप में पूजे जाते हैं। गणेश चतुर्थी पर डोडीताल और आसपास का पूरा कैलासू क्षेत्र आस्था के रंग में रंग जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर मां पार्वती ने गणेश को जन्म दिया था और मां अन्नपूर्णा के रूप में आज भी उनकी पूजा होती है।
गणेश चतुर्थी के मौके पर उत्तरकाशी के केलशू घाटी के दस गांवों ने गणेश महोत्सव का शुभारंभ किया। कंडार देवता मंदिर से भगवान गणेश की शोभायात्रा निकाली गई। ढोल-दमाऊं और रणसिंघा की गूंज के बीच शोभायात्रा विश्वनाथ मंदिर, मुख्य बाजार, बस अड्डे और भटवाड़ी रोड होते हुए नगर के विभिन्न हिस्सों से गुजरी। अगोड़ा, ढासड़ा, दंदालका, भंकोली, गजोली, नौगांव, सेकू और नाल्ड समेत आसपास के गांवों से पहुंचे ग्रामीणों ने रासो-तांदी लोकनृत्य प्रस्तुत कर पारंपरिक संस्कृति की झलक दिखाई।
स्कंद पुराण के केदारखंड के मुताबिक, मां पार्वती स्नान के लिए गईं तो उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। यही बालक गणेश कहलाए। माता ने उन्हें द्वार पर पहरा देते हुए किसी को भी अंदर नहीं आने देने की आज्ञा दी। इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश ने माता की आज्ञा के कारण शिव को भी अंदर जाने से रोक दिया। विवाद बढ़ा और भगवान शिव ने गणेश का सिर काट दिया। माता पार्वती के क्रोधित होने पर भगवान शिव ने गणेश को पुनर्जीवन दिया और उनके धड़ पर हाथी का सिर लगाया। इसी के बाद गणेश गजानन कहलाए। स्थानीय लोग इसी कथा को डोडीताल से जोड़ते हैं।
डोडीताल को गणेश जन्मभूमि मानने की परंपरा को स्थानीय लोग स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित प्रसंगों से जोड़ते हैं। केदारखंड के अध्याय 10 में गणेश के प्रकृति से उत्पन्न होने का उल्लेख मिलता है। स्थानीय मान्यता में डोडीताल को डुंडीसर से भी जोड़ा जाता है। गणेश की पूजा और चतुर्थी से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख केदारखंड के अध्याय 11 में भी बताया जाता है। डोडीताल की इस मान्यता का संदर्भ स्वामी तपोवन की पुस्तक श्हिमगिरि विहारश् में भी स्थानीय लोग बताते हैं। कैलासू क्षेत्र के ग्रामीण पीढ़ियों से इस धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाते आए हैं।
शोभायात्रा के बाद दस दिनों तक बेस कैंप अगोड़ा गांव में भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। महोत्सव के अंतिम तीन दिनों में जिले के विभिन्न गांवों से देवडोलियों का समागम होगा। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। अंतिम दिन देवडोलियों के सानिध्य में अगोड़ा गांव की पवित्र धारा में गणेश प्रतिमा स्थापित की जाएगी।
डोडीताल की लोक आस्था को एक पारंपरिक गीत भी जीवंत रखता है। गणेश जन्मभूमि डोडीताल कैलासू, असी गंगा उद्गम अरू माता अन्नपूर्णा निवासू। श्रद्धालुओं के लिए यही विश्वास डोडीताल को सिर्फ एक तीर्थ नहीं, बल्कि गणेश की जन्मकथा से जुड़ी जीवंत धार्मिक धरोहर बनाता है।



