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देवीधुरा में ऐतिहासिक बग्वाल परंपरा में 180 बग्वाली वीर घायल

रक्षाबंधन पर अनोखे युद्ध की परंपरा, फल-फूल के साथ पत्थरों की बरसात

देवीधुरा में ऐतिहासिक बग्वाल परंपरा में 180 बग्वाली वीर घायल
रक्षाबंधन पर अनोखे युद्ध की परंपरा, फल-फूल के साथ पत्थरों की बरसात
चंपावत। उत्तराखंड के चंपावत जिले के देवीधुरा में रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सदियों पुरानी ऐतिहासिक बग्वाल परंपरा ने एक बार फिर रोमांच और आस्था का अद्भुत संगम दिखाया। दोपहर 1 बजकर 48 मिनट पर मां बाराही के जयकारों के बीच शुरू हुई बग्वाल में चार खाम-सात थोक के बग्वाली वीरों के बीच करीब आठ मिनट तक फल-फूल और पत्थरों की जमकर बरसात हुई।
हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में बग्वाल का मैदान देखते ही देखते रणभूमि में तब्दील हो गया। इस दौरान करीब 180 लोग घायल हुए, जबकि चार घायलों को जिला अस्पताल रेफर किया गया। खास बात यह रही कि बग्वाल समाप्त होते ही दोनों पक्षों के बग्वाली वीरों ने एक-दूसरे को गले लगाकर भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश दिया।
रक्षाबंधन के पावन पर्व पर विश्व प्रसिद्ध मां बाराही धाम देवीधुरा में सदियों पुरानी ऐतिहासिक बग्वाल परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी। दोपहर 1 बजकर 48 मिनट पर शुरू हुई बग्वाल करीब आठ मिनट तक चली। बग्वाल के रोमांच को देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचे। बग्वाल शुरू होते ही मां बाराही के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा और देखते ही देखते बग्वाल मैदान रणभूमि में तब्दील हो गया। वालिक, चम्याल, गहड़वाल और लमगड़िया खाम के बग्वाली वीर पारंपरिक वेशभूषा में हाथों में ढाल लेकर मैदान में उतरे। करीब आठ मिनट तक दोनों पक्षों के बीच फल-फूल और पत्थरों की बरसात होती रही। बग्वाल करीब 1 बजकर 55 मिनट पर समाप्त हुई।
बग्वाल के दौरान पत्थरों की चोट लगने से करीब 180 बग्वाली वीर और श्रद्धालु घायल हुए। मौके पर मौजूद स्वास्थ्य टीमों ने घायलों को प्राथमिक उपचार दिया। वहीं चार घायलों की हालत को देखते हुए उन्हें जिला चिकित्सालय रेफर किया गया। किसी के सिर पर चोट लगी तो किसी के शरीर के दूसरे हिस्से में चोट आई, लेकिन बग्वालियों की आस्था में इसका कोई असर नहीं दिखा। घायल बग्वालियों का कहना था कि मां बाराही की बग्वाल में लगने वाली चोट उनके लिए दर्द नहीं, बल्कि देवी का आशीर्वाद है। बग्वालियों ने कहा कि सदियों से चली आ रही इस परंपरा को वे पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ निभाते आ रहे हैं। बग्वाल समाप्त होते ही माहौल पूरी तरह बदल गया। कुछ मिनट पहले जिस मैदान में पत्थरों की बरसात हो रही थी, उसी मैदान में दोनों पक्षों के बग्वाली वीरों ने एक-दूसरे को गले लगाकर भाईचारे और प्रेम का संदेश दिया। यही देवीधुरा की बग्वाल की सबसे अनूठी विशेषता है। यह केवल रण का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और सामाजिक एकजुटता की जीवंत मिसाल है।
सीएम धामी बने ऐतिहासिक बग्वाल के साक्षी
 बग्वाल में शामिल होने पहुंचे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मां बाराही के दर्शन कर विधिवत पूजा-अर्चना की और प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। मुख्यमंत्री ने देवीधुरा की बग्वाल को उत्तराखंड की आस्था, लोकसंस्कृति और सामुदायिक सहभागिता की अनूठी मिसाल बताया। उन्होंने देवीधुरा को नगर पंचायत क्षेत्र बनाने की घोषणा की। साथ ही करीब 9।80 करोड़ रुपये की लागत से मल्टी लेवल पार्किंग बनाए जाने की बात कही। मुख्यमंत्री ने कहा कि बग्वाल मेले को राजकीय मेला घोषित किए जाने के बाद इसकी गरिमा और बढ़ी है। श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मेले में व्यवस्थाओं को लगातार बेहतर किया जा रहा है।
बग्वाल युद्ध नहीं, आस्था और भाईचारे की परंपरा
देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल में फल-फूल और पत्थरों की बरसात भले ही कुछ देर के लिए रणभूमि का एहसास कराती है, लेकिन इसके पीछे सदियों पुरानी आस्था और परंपरा जुड़ी हुई है। करीब 180 लोगों के घायल होने और चार घायलों के जिला चिकित्सालय रेफर होने के बावजूद बग्वालियों की श्रद्धा और उत्साह में कोई कमी नहीं दिखाई दी। पत्थरों के अनूठे रण के बाद एक-दूसरे को गले लगाते बग्वाली वीरों ने संदेश दिया कि बग्वाल केवल युद्ध का प्रतीक नहीं, बल्कि मां बाराही की आस्था, लोकसंस्कृति, सामाजिक एकता और भाईचारे की जीवंत परंपरा है।

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