उत्तराखंड

कल कुरूड़ से शुरू होगी नंदा देवी लोकजात, 18 सितंबर को पहुंचेगी वेदनी बुग्याल

यात्रा 7वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा शालिपाल ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। उन्होंने राजधानी चांदपुर गढ़ी से मां नंदा को हर 12वें वर्ष मायके से कैलाश भेजने की परंपरा शुरू की।

5 सितंबर को कैलाश के लिए रवाना होंगी मां नंदा, चौसिंग्या खाडू बनेगा मां का मार्गदर्शक
13 पड़ावों से गुजरकर नंदा सप्तमी पर वेदनी कुंड में होगी विशेष पूजा
25 सितंबर को देवराड़ा पहुंचेगी उत्सव डोली

चमोली। मां नंदा की बड़ी लोकजात यात्रा पांच सितंबर को अपराह्न तीन बजे नंदा सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना होगी। यात्रा को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। बड़ी लोकजात को लेकर नंदानगर ब्लॉक समेत आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है।
कुरुड़ मंदिर समिति के अध्यक्ष सुखबीर रौतेला ने बताया कि पांच सितंबर को नंदा सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा की तीनों डोलियां कैलाश के लिए रवाना होंगी। विभिन्न पड़ावों से होते हुए यात्रा 12 सितंबर को रामणी पहुंचेगी। यहां विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन होगा। इसके बाद यात्रा आला, सितेल और कनोंल होते हुए आगे बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि 15 सितंबर को वाण स्थित लाटू मंदिर में मां नंदा की डोली का प्रवास होगा। वाण से गैरोली पाताल होते हुए 18 सितंबर को उत्सव डोली वेदनी बुग्याल पहुंचेगी, जहां सप्तमी की पूजा-अर्चना होगी।
19 सितंबर को यात्रा बगुवावासा, पातरनचौणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड और ज्यूंरागली होते हुए शिलासमुद्र पहुंचेगी। 20 सितंबर को होमकुंड में पूजा के बाद चौंसिंग्या खाड़ू की कैलाश विदाई होगी। धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार, पूजा-अर्चना के बाद नंदा भक्त जामुनडाली में रात्रि प्रवास करेंगे। वापसी के दौरान मां नंदा की उत्सव डोली 30 सितंबर को सुतोल, पेरी, सितेल, गुलाड़ी, नांरगी और फरखेत होते हुए कुरुड़ मंदिर पहुंचेगी। इसी के साथ बड़ी लोकजात यात्रा का समापन होगा। उन्होंने बताया कि यात्रा को सुचारु रूप से संपन्न कराने के लिए विभिन्न पड़ावों पर समितियों का गठन कर दिया गया है। दुर्गम पड़ावों पर सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी पुलिस और एसडीआरएफ की टीमें संभालेंगी।
बता दें कि, इस साल कुरुड़ मंदिर समिति बड़ी लोकजात यात्रा का आयोजन कर रही है। 12 वर्ष का समय चक्र इस साल पूरा होने के कारण कुरुड़ समिति ने अपनी परंपरा के अनुसार इसी साल 5 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक यात्रा को आयोजित करने का फैसला लिया है। मुख्य नंदा देवी राजजात यात्रा 2027 में होगी। नौटी राजजात समिति और प्रशासन ने इसे 2027 तक स्थगित करने का सर्वसम्मति से फैसला लिया है। समिति और प्रशासन का मानना है कि 2026 के पंचांगीय कालक्रम के दौरान मलमास आ रहा है और ऐसे समय में हिंदू मान्यताओं के अनुसार, बड़े स्तर के मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। इस स्थिति को देखते हुए पंचांगीय गणना के आधार पर यात्रा को 2027 तक आगे बढ़ाया गया।
इसी के साथ सुरक्षा का भी एक कारण रहा। दरअसल, राजजात यात्रा मार्ग बेहद खतरनाक और रूपकुंड और शिला समुद्र जैसे ग्लेशियरों से होकर गुजरता है। करीब 260 किमी के इस दुर्गम रास्ते को यात्रा के लिए दुरुस्त करने और यहां बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए सरकार और प्रशासन ने एक साल का अतिरिक्त समय मांगा था। साथ ही इतनी बड़ी यात्रा में सुरक्षा व्यवस्था भी पुख्ता की जाएगी। तो इस साल कुरुड़ की बड़ी लोकजात हो रही है जो चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ देवराड़ा से प्रारंभ होगी। इसका आयोजन नंदा देवी कुरुड़ मंदिर समिति के हक-हकूकधारी कर रहे हैं। वहीं अगले साल ऐतिहासिक नंदा राजजात का आयोजन होगा जो चमोली जिले के नौटी गांव से प्रारंभ होगी। यात्रा 7वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा शालिपाल ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। उन्होंने राजधानी चांदपुर गढ़ी से मां नंदा को हर 12वें वर्ष मायके से कैलाश भेजने की परंपरा शुरू की। बाद में राजा कनकपाल ने इस यात्रा को भव्य स्वरूप दिया। यह परंपरा 12 वर्ष या उससे अधिक समय के अंतराल पर निभाई जाती है।
इसका संचालन गढ़वाल राजा के प्रतिनिधि कांसुवा गांव के राज कुंवर, नौटी गांव के राजगुरु नौटियाल ब्राह्मण समेत 12 थोकी ब्राह्मण और चौदह सयानों के सहयोग से होता है। मान्यता के अनुसार नंदा के मायके वाले नंदा को कैलाश विदा करने जाते हैं और फिर वापस लौट आते हैं। भगवान शिव नंदा के पति हैं। कहा जाता है कि देवी नंदा हर बारह साल में अपने मायके आती हैं। यह परंपरा पौराणिक काल से चली आ रही है और आज भी पहाड़ के लोग इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। देवभूमि उत्तराखंड की नंदा राजजात यात्रा धार्मिक यात्रा के साथ ही ऐतिहासिक धरोहर भी है। जिसे विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक माना जाता है। नंदा राजजात यात्रा गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में होती है, जो सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को संजोए हुई है।
यात्रा में 19 दिन कठिन बुग्यालों की चढ़ाई पार करनी पड़ती है। करीब 260 किलोमीटर पैदल दूरी नापनी पड़ती है। साल 2026 में आयोजित होने वाली इस यात्रा को भव्य आयोजित के लिए सरकार द्वारा तैयारियां की जा रही हैं। नंदादेवी राजजात यात्रा 12 वर्षों में आयोजित की जाती है। इस पवित्र यात्रा में स्थानीय लोग और देश-विदेश के पर्यटक शामिल होते हैं। नंदादेवी राजजात यात्रा को हिमालय का श्कुंभश् भी कहा जाता है।

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