देव पुजा का समापन ’नर पूजा’ का आगाज, उमड़ा आस्था का सैलाब
मेरू-सुमेरू पर्वत की तलहटी के बीच केदार सिंह पर्वत और मंदाकिनी के तट पर भगवान केदारनाथ का भव्य मंदिर विराजमान है।

आज खुलेंगे केदारनाथ के कपाट, भक्ति के रंग में डूबी केदारपुरी
कपाट खुलने को लेकर देश-विदेश से पहुंचे भक्तों का लगा तांता
रुद्रप्रयाग। हिमालय की गोद में बसे विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम के कपाट आज विधि-विधान के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। कपाट खुलने को लेकर देश-विदेश से पहुंचे भक्तों में भारी उत्साह देखा जा रहा है। बाबा केदार के जयकारों से पूरा धाम गुंजायमान है और वातावरण पूरी तरह भक्ति के रंग में रंग चुका है।
केदारनाथ धाम को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में ग्यारहवें ज्यातिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है। ग्रीष्मकाल के छह माह नर तो शीतकाल के छह माह में देवता भगवान केदारनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं। केदारनाथ धाम उत्तराखंड के चार धामों में से एक और पंच केदार में प्रथम केदार के रूप में पूजा जाता है। शीतकाल में केदारनाथ धाम में बर्फबारी होने के बाद कपाट छह माह के लिये कपाट बंद हो जाते हैं और शीतकालीन पूजा-अर्चना शीतकालीन गददीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में संपंन की जाती है।
मेरू-सुमेरू पर्वत की तलहटी के बीच केदार सिंह पर्वत और मंदाकिनी के तट पर भगवान केदारनाथ का भव्य मंदिर विराजमान है। मान्यता है कि द्वापर युग मंे पांडव गौत्र हत्या की मुक्ति से केदारनाथ धाम आये थे। भगवान शिव ने पांडवों को यहां महिष रूप में दर्शन दिये थे। जिसके बाद यहां पांडवों ने भगवान शिव के केदारनाथ के रूप में ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान शिव का त्रिकोणीय आकार में शिव लिंग स्थित है। यह भी मान्यता है कि यह ज्योतिर्लिंग सतयुग का है और सतयुग में यहां नर-नारायण भगवान केदारनाथ की तपस्या करते थे। केदारनाथ धाम मंदाकिनी नदी का उदगम स्थल भी है। प्रत्येक वर्ष अप्रैल-मई माह में छह माह ग्रीष्मकाल के लिये भगवान केदारनाथ के कपाट आम भक्तों के दर्शनों के लिये खुले रहते हैं। जबकि शीतकाल में दीपावली के बाद भैयादूज के पर्व पर केदारनाथ के कपाट बंद किये जाते हैं।
आपदा के बाद बदली तस्वीर
रुद्रप्रयाग। 2013 केदारनाथ आपदा ने केदारनाथ धाम और आसपास के क्षेत्र को गहरा आघात पहुंचाया था। भारी तबाही के बाद जहां एक ओर यात्रा को लेकर आशंकाएं थीं, वहीं दूसरी ओर पुनर्निर्माण और व्यवस्थाओं में व्यापक सुधार ने इस तीर्थ को नए आयाम दिए। आधुनिक सुविधाओं, बेहतर सड़क और पैदल मार्ग, हेलीकॉप्टर सेवाओं और सुरक्षा व्यवस्थाओं के चलते आज यात्रा पहले से कहीं अधिक सुगम और सुरक्षित हो गई है।
हर साल बढ़ रही श्रद्धालुओं की संख्या
रुद्रप्रयाग। आपदा के बाद जहां यात्रा पर असर पड़ा था, वहीं अब हर साल श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। लाखों की संख्या में भक्त बाबा केदार के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। सरकार और प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्थाओं के चलते यात्रा का स्वरूप अधिक संगठित और व्यवस्थित हुआ है।
आस्था के साथ आर्थिक मजबूती
केदारनाथ यात्रा अब केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी बन चुकी है। हर साल रिकॉर्ड संख्या में पहुँच रहे श्रद्धालुओं के कारण स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं और क्षेत्रीय पर्यटन को नई ऊंचाइयों मिली हैं।
6 माह ’नर’ तो 6 माह ’देव’ पूजा का विधान
रुद्रप्रयाग। केदारनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ ही धार्मिक परंपराओं का एक अनूठा क्रम शुरू हो जाता है। मान्यता है कि यहां वर्ष के छह माह ‘नर पूजा’ और शेष छह माह ‘देव पूजा’ का विधान है। कपाट खुलने के बाद अगले छह महीनों तक मंदिर में पूजा-अर्चना मनुष्यों यानी ‘नर’ द्वारा की जाती है। इस दौरान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन कर विधि-विधान से पूजा करते हैं और बाबा केदार का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। वहीं शीतकाल में कपाट बंद होने के बाद यह मान्यता है कि देवता स्वयं यहां ‘देव पूजा’ करते हैं। इस अवधि में केदारनाथ धाम मानव गतिविधियों से विरक्त रहता है और पूजा का आध्यात्मिक क्रम देव शक्तियों द्वारा संचालित माना जाता है। यह परंपरा केदारनाथ धाम की विशेष धार्मिक पहचान है, जो इसे अन्य तीर्थ स्थलों से अलग बनाती है। कपाट खुलने के साथ ही शुरू होने वाली ‘नर पूजा’ का यह छह माह का काल श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है।
भुकुंट भैरव: केदारपुरी के क्षेत्ररक्षक
रुद्रप्रयाग। केदारनाथ धाम में भुकुंट भैरव की भी विशेष मान्यता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार भुकुंट भैरव को केदारपुरी का रक्षक देवता माना जाता है, जो पूरे क्षेत्र की निगरानी करते हैं और धाम की रक्षा करते हैं। मान्यता है कि जब शीतकाल में केदारनाथ धाम के कपाट बंद हो जाते हैं और पूरा क्षेत्र बर्फ से ढक जाता है, तब भी भुकुंट भैरव यहां विराजमान रहते हैं और केदारपुरी की रक्षा करते हैं। इस दौरान भगवान शिव के धाम की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन्हीं पर होती है। कपाट खुलने के बाद श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शन से पहले या बाद में भुकुंट भैरव के मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि भैरव बाबा के दर्शन किए बिना केदारनाथ यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। स्थानीय पुजारियों के अनुसार भुकुंट भैरव की कृपा से ही केदारपुरी हर संकट से सुरक्षित रहती है। यही कारण है कि श्रद्धालुओं में इनके प्रति गहरी आस्था देखने को मिलती है।



