
रिजर्व में खतरे की आहट, इंसानी दखल बंद फिर भी दोगुने हुए भूस्खलन
बर्फ पिघलने के करण नई ग्लेशियर झील भी बनी
ग्लोबल वार्मिंग के असर ने ग्लेशियरों के पिघलने का सिलसिला जारी
देहरादून। उत्तराखंड के नंदा देवी नेशनल पार्क में प्राकृतिक बदलावों को लेकर चिंता बढ़ रही है। वैज्ञानिकों के अध्ययन में इस क्षेत्र में मृदा क्षरण और भूस्खलन की घटनाएं सामने आई हैं। ग्लोबल वार्मिंग के असर से ग्लेशियरों के पिघलने का सिलसिला भी जारी है, जिसका प्रभाव वन्यजीवों के प्राकृतिक वास स्थल पर पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक नंदा देवी ग्लेशियर क्षेत्र में कुछ स्थानों पर झीलों का निर्माण भी हुआ है, जिनकी भविष्य में निगरानी जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते भूस्खलन, मृदा क्षरण और ग्लेशियरों में बदलाव को गंभीरता से मॉनिटर करना होगा, ताकि संभावित प्राकृतिक खतरे और इसके असर को समय रहते समझा जा सके।
इंसानी गतिविधियों से दूर प्रकृति की गोद में बसा नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क भी अब पर्यावरणीय बदलावों के खतरों से अछूता नहीं है। यहां बढ़ते भूस्खलन, मृदा क्षरण और ग्लेशियरों के पिघलने के संकेत सामने आए हैं। चिंता की बात यह है कि ये बदलाव उस क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं, जहां मानवीय हस्तक्षेप को रोकने के लिए सख्त प्रतिबंध लागू हैं।
वैज्ञानिकों के अध्ययन में सामने आए संकेत बताते हैं कि इंसानी गतिविधियों पर रोक लगाने के बावजूद प्राकृतिक और जलवायु संबंधी चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। इसका असर आने वाले समय में इस क्षेत्र की वनस्पतियों, वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक वास स्थलों पर पड़ सकता है।
राष्ट्रीय पार्क नंदा देवी की पर्यावरणीय स्थिति, वन्यजीवों और प्राकृतिक परिस्थितियों में हो रहे बदलावों को समझने के लिए वर्ष 2026 में एक्सपेडिशन नंदा देवी के तहत अभियान दल भेजा गया। इस अभियान में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। दल ने पार्क के भीतर वन्यजीवों, वनस्पतियों, ग्लेशियरों और भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन किया। इस अभियान का उद्देश्य लंबे समय से जुटाए जा रहे आंकड़ों और पुराने रिकॉर्ड की तुलना कर यह समझना था कि इस संरक्षित क्षेत्र में पर्यावरण किस तरह बदल रहा है। अभियान के दौरान जुटाई गई जानकारियों में सबसे महत्वपूर्ण संकेत भूस्खलन के बढ़ते क्षेत्रों से जुड़े हैं।
एक्सपेडिशन नंदा देवी के दौरान ग्लेशियरों की स्थिति का भी अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से नंदा देवी क्षेत्र के ग्लेशियर भी पिघल रहे हैं। हालांकि उपलब्ध तुलनात्मक आकलन के अनुसार यहां ग्लेशियरों के पिघलने की गति गंगोत्री ग्लेशियर के मुकाबले कम बताई गई है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सुरक्षित है। ग्लेशियरों में होने वाले बदलावों का असर केवल बर्फ के घटने तक सीमित नहीं रहता। इससे पर्वतीय जल प्रणालियों, आसपास के भूभाग और प्राकृतिक पारिस्थितिकी में भी बदलाव हो सकते हैं। नंदा देवी जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में इन परिवर्तनों को समझने के लिए ग्लेशियरों की स्थिति, उनके आसपास के भूभाग और जल निकायों पर लगातार नजर रखना जरूरी है।
अध्ययन के दौरान एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। वैज्ञानिकों के अनुसार नंदा देवी ग्लेशियर क्षेत्र के कुछ स्थानों पर झीलें भी विकसित हो रही हैं। इन झीलों की स्थिति, आकार और भविष्य में उनमें होने वाले बदलावों की निगरानी जरूरी मानी जा रही है। हालांकि किसी झील से वास्तविक खतरे का आकलन करने के लिए उसके आकार, जलस्तर, प्राकृतिक निकास और आसपास की भूगर्भीय परिस्थितियों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।
11 बड़े भूस्खलन जोन दर्ज किए गए
भू-वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले दशक के आंकड़ों की तुलना करने पर पता चलता है कि नंदा देवी क्षेत्र में बड़े भूस्खलन जोन की संख्या बढ़ी है। पहले जहां करीब 11 बड़े भूस्खलन जोन दर्ज किए गए थे, वहीं अब इनकी संख्या 16 से 20 तक बताई जा रही है। यानी पिछले 10 साल में बड़े भूस्खलन क्षेत्रों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इससे इस क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिरता और मिट्टी के लगातार क्षरण को लेकर चिंता बढ़ी है।
10 साल में बढ़े भूस्खलन के क्षेत्र नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क का दुर्गम भूभाग और संवेदनशील पारिस्थितिकी इसे पर्यावरणीय अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाते हैं। यहां भूस्खलन और मृदा क्षरण की स्थिति का आकलन करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इनका सीधा संबंध वनस्पतियों के विकास और वन्यजीवों के प्राकृतिक वास स्थलों से हो सकता है। भूवैज्ञानिक एमपीएस बिष्ट के मुताबिक इस क्षेत्र में भूस्खलन जोन बढ़ने के संकेत मिले हैं। मिट्टी का क्षरण होने से वनस्पतियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इंसानी गतिविधियां नहीं होने के बावजूद यहां पर्यावरणीय बदलाव जारी हैं। ग्लोबल वार्मिंग का असर ग्लेशियरों पर भी दिखाई दे रहा है। ऐसे में इन बदलावों का नियमित अध्ययन और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी बेहद जरूरी है।
मिट्टी का क्षरण लगातार बढ़ना बड़ा खतरा
भूस्खलन क्षेत्रों की संख्या में बढ़ोतरी केवल पहाड़ों के खिसकने तक सीमित चिंता नहीं है। इसका असर जमीन की संरचना, मिट्टी की उपलब्धता और वनस्पतियों की स्थिति पर भी पड़ सकता है। यदि किसी क्षेत्र में मिट्टी का क्षरण लगातार बढ़ता है, तो वहां वनस्पतियों के टिके रहने और उनके प्राकृतिक विस्तार की परिस्थितियां प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि इन बदलावों का वन्यजीवों पर वास्तविक प्रभाव समझने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों के आंकड़ों और लंबे समय के अध्ययन की जरूरत होगी।
झीलों की निगरानी जरूरी, समय रहते खतरे को समझना चुनौती
हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलों पर विशेष नजर रखी जाती है। कुछ परिस्थितियों में झीलों के प्राकृतिक किनारे कमजोर होने या उनमें जमा पानी के अचानक बाहर निकलने से नीचे के क्षेत्रों में नुकसान की आशंका पैदा हो सकती है। हालांकि नंदा देवी क्षेत्र में जिन झीलों का उल्लेख किया गया है, उनके बारे में किसी संभावित खतरे की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक आकलन जरूरी होगा। ऐसे में एक्सपेडिशन के दौरान सामने आए संकेत इस क्षेत्र में आगे भी अध्ययन किए जाने की जरूरत को रेखांकित करते हैं। भूस्खलन के बढ़ते जोन, मृदा क्षरण और ग्लेशियरों में बदलाव को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय इनके बीच संभावित संबंधों को समझना महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए पुराने और नए आंकड़ों की तुलना, संवेदनशील स्थानों की पहचान और नियमित निगरानी की व्यवस्था प्रभावी साबित हो सकती है।
वन्यजीवों के वास स्थल भी बदल रहे
नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क में पर्यावरणीय बदलावों का एक महत्वपूर्ण पहलू वन्यजीवों के प्राकृतिक वास स्थलों से जुड़ा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व निदेशक जीएस रावत के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग का असर इस क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है। यहां ग्लेशियरों के पिघलने के साथ वन्यजीवों के वास स्थलों में भी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। कुछ वन्यजीव पहले के मुकाबले अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रहे हैं। वन्यजीवों के वास स्थलों में बदलाव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण विषय है। तापमान, वनस्पतियों की उपलब्धता और प्राकृतिक आवास की परिस्थितियों में बदलाव से प्रजातियों के रहने और भोजन तलाशने के क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में केवल वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके प्राकृतिक वास स्थलों में आ रहे बदलावों को भी समझना जरूरी है। नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क में मानवीय गतिविधियों को सीमित करने का उद्देश्य इसकी संवेदनशील पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखना है। लेकिन एक्सपेडिशन नंदा देवी के दौरान सामने आए संकेत बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रियाएं भी इस क्षेत्र की परिस्थितियों को प्रभावित कर रही हैं।



