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नदी से लेकर भूजल तक बनेगा इंटीग्रेटेड मॉडल

यही वजह है कि कार्यशाला में वाटरशेड स्तर के बिखरे हुए हस्तक्षेपों से आगे बढ़कर नदी-बेसिन स्तर की एकीकृत योजना पर जोर दिया गया।

पहाड़ में पानी का संकट बढ़ा तो बदलना होगा पूरा नजरिया
‘इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्सेज मॉडलिंग एंड बेसिन मैनेजमेंट यूजिंग मेक हाइड्रो बेसिन’ पर कार्यशाला आयोजित
देहरादून की रिस्पना नदी से जुड़े कार्यों के अनुभव भी सामने रख
देहरादून। उत्तराखंड में बदलते मौसम, अचानक आने वाली बाढ़, सूखते जलस्रोत और भूजल पर बढ़ते दबाव के बीच देहरादून में दो दिन चली राष्ट्रीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने जल प्रबंधन को अलग-अलग परियोजनाओं के बजाय पूरे नदी बेसिन के स्तर पर देखने की जरूरत बताई।
उत्तराखंड के पहाड़ों में पानी की समस्या केवल पानी की कमी की नहीं है, बल्कि पानी के असंतुलित प्रबंधन की भी है। कहीं बारिश का पानी कुछ घंटों में बाढ़ बनकर बह जाता है तो कहीं गर्मियों में गांवों के प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगते हैं। नदियों में अचानक बढ़ता जलस्तर, बदलता मानसून, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं जल संसाधनों के सामने नई चुनौती खड़ी कर रही हैं। ऐसे में अब जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन को अलग-अलग गतिविधियों के तौर पर देखने के बजाय पूरे नदी बेसिन को एक इकाई मानकर काम करने पर जोर दिया जा रहा है।
देहरादून स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान में 7 और 8 सितंबर को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला में इसी सोच को तकनीक और वैज्ञानिक मॉडल के साथ जोड़ने की कोशिश हुई। ‘इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्सेज मॉडलिंग एंड बेसिन मैनेजमेंट यूजिंग मेक हाइड्रो बेसिन’ विषय पर हुई इस कार्यशाला में देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के करीब 400 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। 98 जिलों से वैज्ञानिक, शोधकर्ता, विद्यार्थी और विभिन्न विभागों के अधिकारी इस कार्यक्रम से जुड़े।
विशेषज्ञों के मुताबिक अब तक जल संरक्षण के कई प्रयास स्थानीय स्तर पर होते रहे हैं। किसी गांव में जलस्रोत संरक्षण, कहीं चेकडैम, कहीं वाटरशेड ट्रीटमेंट तो कहीं नदी पुनर्जीवन की योजना चलती है, लेकिन एक नदी केवल उस स्थान तक सीमित नहीं होती जहां उसका पानी दिखाई देता है। उसकी सहायक धाराएं, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, बारिश, जंगल, कृषि क्षेत्र और मानवीय गतिविधियां सभी एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। यही वजह है कि कार्यशाला में वाटरशेड स्तर के बिखरे हुए हस्तक्षेपों से आगे बढ़कर नदी-बेसिन स्तर की एकीकृत योजना पर जोर दिया गया।
कार्यशाला के कार्यक्रम निदेशक और आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. अम्बरीश कुमार ने कहा कि वैज्ञानिक मॉडलिंग के जरिए बेसिन से जुड़े आंकड़ों को जल प्रबंधन के व्यावहारिक फैसलों में बदला जा सकता है। खासतौर पर उत्तराखंड में स्प्रिंग एंड रिवर रीजुवेनेशन अथॉरिटी यानी सार्रा के श्वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर जैसे प्रयासों के लिए यह दृष्टिकोण उपयोगी हो सकता है।
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां इसे जल प्रबंधन के लिहाज से बेहद संवेदनशील बनाती हैं। राज्य में ऊंचाई के साथ मौसम, वर्षा और जल उपलब्धता में बड़ा अंतर है। पहाड़ों में बड़ी संख्या में प्राकृतिक जलस्रोत हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में इनके प्रवाह में कमी की समस्या सामने आती रही है। दूसरी तरफ मानसून के दौरान कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने पर नदियां और गदेरे उफान पर आ जाते हैं। यानी चुनौती दोहरी है। बारिश के समय पानी को संभालना और जरूरत के समय पानी उपलब्ध कराना।
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड जलागम प्रबंधन निदेशालय के संयुक्त निदेशक डॉ. ए. के. डिमरी ने हाल की फ्लैश फ्लड घटनाओं और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वाटरशेड विकास के कार्यों को नदी-बेसिन के बड़े परिप्रेक्ष्य में करने की जरूरत है। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहाड़ में किसी एक जलधारा पर किया गया काम, तभी स्थायी परिणाम दे सकता है, जब उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र को समझा जाए।
डॉ. ए. के. डिमरी ने उदाहरण के तौर पर बताया कि बारिश कहां हो रही है, पानी किस दिशा में जा रहा है, कहां मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है, कहां भूजल रिचार्ज हो सकता है और किन स्थानों पर बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। इन सभी सवालों का जवाब एक साथ तलाशना होगा।
कार्यशाला में नदी पुनर्जीवन को लेकर भी एक महत्वपूर्ण बात सामने आई। किसी नदी को पुनर्जीवित करने का मतलब केवल उसके किनारे सफाई करना या नदी में पानी बढ़ाना नहीं है। नदी का अपना पूरा कैचमेंट होता है। जैसे ऊपर के जंगल, छोटी धाराएं, झरने, मिट्टी, भूजल और बारिश सभी नदी के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। कार्यक्रम में अतिथि वक्ता रहे डॉ. डी. एस.  रावत ने आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी और सार्रा के बीच संस्थागत सहयोग की जरूरत पर जोर दिया। वहीं राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान रुड़की के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. आर.पी. पांडे ने नदी पुनर्जीवन के अपने अनुभव साझा किए और देहरादून की रिस्पना नदी से जुड़े कार्यों के अनुभव भी सामने रखे।

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